विस्तृत उत्तर
दीप प्रज्वलन सनातन धर्म में प्रत्येक शुभ कार्य, पूजा और समारोह के आरम्भ में किया जाता है। दीपक की लौ ज्ञान, पवित्रता और परब्रह्म के तेज का प्रतीक मानी गई है। ब्रह्मपुराण में उल्लेख है कि प्रलयकाल में भी ज्योति-स्वरूप परमात्मा ही प्रकाशमान रहते हैं।
दीप जलाते समय निम्न दो मंत्रों का पाठ किया जाता है:
प्रथम मंत्र:
दीपज्योतिः परं ज्योतिः दीपज्योतिर्जनार्दनः।
दीपो हरतु मे पापं दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
अर्थ: दीप की ज्योति परब्रह्म स्वरूप है, दीप की ज्योति जनार्दन (विष्णु) का स्वरूप है। यह दीपक मेरे पापों को हर ले, दीप की ज्योति को मेरा प्रणाम।
द्वितीय मंत्र:
शुभं करोति कल्याणम् आरोग्यम् धनसंपदा।
शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
अर्थ: जो शुभ करता है, कल्याण करता है, स्वास्थ्य और धन-संपदा प्रदान करता है तथा शत्रु की दुर्बुद्धि का नाश करता है — ऐसे दीप की ज्योति को मेरा नमन।
दीपक जलाने की दिशा का भी विधान है — सूर्योन्मुख या पूर्वाभिमुख दीपक सबसे शुभ माना जाता है। दीपक की लौ सदा ऊपर की ओर उठती है, इसीलिए यह मानव-जीवन के उर्ध्वगामी होने का प्रतीक भी है।





