विस्तृत उत्तर
जब आत्मदेव धुंधुकारी के कारण दुख से टूट जाते हैं, तब ज्ञानी गोकर्ण उन्हें वैराग्य का उपदेश देते हैं। वे कहते हैं कि यह संसार असार है, दुखरूप है और मोह में डालने वाला है। पुत्र किसका है और धन किसका है; स्नेह में पड़ा मनुष्य रात-दिन दीपक की तरह जलता रहता है। सुख इंद्र को भी नहीं और चक्रवर्ती राजा को भी नहीं; सुख तो विरक्त, एकांतजीवी मुनि को है। गोकर्ण आत्मदेव से पुत्र-मोह छोड़ने, शरीर को नश्वर समझने, पत्नी-पुत्र आदि में ममता त्यागने और वन जाने को कहते हैं। आगे वे भगवान के भजन, साधुसेवा, भोग-वैराग्य और कथा-सेवा के रस को जीवन का आधार बताते हैं।
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