विस्तृत उत्तर
हंस गीता का सार यह है कि जीव शरीर, मन और इंद्रिय-विषयों से भिन्न शुद्ध आत्मा है। मन और विषयों का बंधन देहाभिमान से बनता है। जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाएँ माया के गुणों से उत्पन्न होती हैं, पर आत्मा इन सबकी साक्षी है। साधक को तुरीय चेतना में स्थित होकर विवेक की तलवार से अहंकार और ममता की गाँठ काटनी चाहिए। महाभारत की परंपरा में यही ज्ञान सत्य, क्षमा, आत्मसंयम और सहनशीलता के रूप में व्यावहारिक धर्म बनता है। हंस गीता मनुष्य को माया से उठाकर आत्मज्ञान और मोक्ष की ओर ले जाती है।
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