विस्तृत उत्तर
हंस गीता में मन और विषयों का संबंध बद्ध जीव की मुख्य समस्या बताया गया है। मन इंद्रियों के माध्यम से शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध की ओर भागता है। फिर वही विषय वासनाओं और संस्कारों के रूप में मन में बैठ जाते हैं। इस प्रकार मन विषयों को पकड़ता है और विषय मन को बाँध लेते हैं। भगवान हंस बताते हैं कि यह बंधन आत्मा का नहीं, देहाभिमानी जीव का है। आत्मा साक्षी है और मन-विषय दोनों बाहरी आवरण हैं। जब साधक स्वयं को आत्मा रूप में पहचानता है, तब विषयों से वैराग्य स्वतः उत्पन्न होता है।
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