विस्तृत उत्तर
जालंधर का तेज शिव में इसलिए विलीन हुआ क्योंकि वह मूल रूप से शिव की क्रोधाग्नि से उत्पन्न हुआ था। उसकी देह और व्यक्तित्व भले ही असुर रूप में विकसित हुए, पर उसका मूल तेज महादेव का ही अंश था। जब शिव ने उसका वध किया, तो उसका बाहरी अहंकार, वासना और अधर्म समाप्त हो गया। बचा हुआ दिव्य तेज अपने मूल स्रोत में लौट गया। यह घटना अद्वैत भाव को भी दर्शाती है कि हर शक्ति अंततः अपने मूल में वापस मिलती है। जालंधर का वध केवल शरीर का नाश नहीं, बल्कि शिव-तेज का शिव में पुनर्विलय था।
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