विस्तृत उत्तर
कीर्तन भक्ति नवधा भक्ति का दूसरा और अत्यंत शक्तिशाली मार्ग है। 'कीर्तन' शब्द का अर्थ है — भगवान के नाम, गुण, लीला और महिमा का मुखर और उत्साहपूर्ण गायन-उच्चारण करना।
कीर्तन में क्या होता है — भगवान के नामों का उच्च स्वर से और प्रेमभाव से उच्चारण किया जाता है। उनकी लीलाओं का श्रद्धापूर्वक वर्णन और गायन होता है। मृदंग, करताल, हारमोनियम जैसे वाद्यों के साथ भजन-कीर्तन किया जाता है। कभी-कभी भाव-विभोर होकर नृत्य भी होता है।
शास्त्रों में कीर्तन की महत्ता — भागवत पुराण में कहा गया कि कीर्तन के समय भक्त भगवान के सबसे निकट होता है। श्रीनारद, व्यास, वाल्मीकि, शुकदेव और चैतन्य महाप्रभु — ये सब कीर्तन भक्ति के आदर्श माने गए हैं। चैतन्य महाप्रभु (1486-1534 ई.) ने 'हरे कृष्ण' महामंत्र के संकीर्तन को कलियुग में मोक्ष का सर्वसुलभ मार्ग बताया।
कीर्तन की विशेषता यह है कि यह एकांत साधना नहीं है — इसमें समूह में बैठकर, एक-दूसरे के साथ मिलकर भगवान का नाम लिया जाता है। जब अनेक भक्त एक साथ प्रेमपूर्वक नाम लेते हैं तो वातावरण में एक अलौकिक ऊर्जा का संचार होता है। संत कबीर, मीराबाई, तुलसीदास और सूरदास के पद भी कीर्तन का ही रूप हैं।
गीता (9.14) में भगवान ने कहा — 'सततं कीर्तयन्तो मां' — जो सतत मेरा कीर्तन करते हैं, वे महात्मा मुझे भजते हैं।





