विस्तृत उत्तर
महाभारत में निरस्त्र योद्धा पर अस्त्र चलाना कई कारणों से वर्जित था — यह धर्मयुद्ध की मर्यादा और क्षत्रिय-आचार का मूल सिद्धांत था।
कारण — पहला, युद्ध एक धर्म है और धर्म में शत्रु को भी सम्मान देना होता है। दूसरा, जो लड़ नहीं सकता उसे मारना वीरता नहीं बल्कि कायरता है। तीसरा, निरस्त्र पर वार करना छल और अधर्म है। चौथा, क्षत्रिय की पहचान वीरता और न्याय से होती है, निरीह को मारने से नहीं।
कर्ण वध का विशेष प्रसंग — जब कर्ण का रथ का पहिया दलदल में धँस गया और वे निरस्त्र होकर उसे निकालने की कोशिश कर रहे थे, अर्जुन ने उस समय उन पर बाण चलाने से हिचकिचाया। कृष्ण ने कहा — 'जब अभिमन्यु सात महारथियों से घिरा था, तब कर्ण ने उसे निरस्त्र करके मारा था। जब द्रौपदी का अपमान हो रहा था तब कर्ण ने अधर्म किया था। जो बोया वह काट रहा है।'
आध्यात्मिक दृष्टि — युद्ध में जीवन और मृत्यु दोनों को धर्म से स्वीकार करना क्षत्रिय का परम कर्तव्य था। निरस्त्र पर वार न करना यह भाव था कि शत्रु को भी लड़कर मरने का अधिकार है।





