विस्तृत उत्तर
नारद और व्यास संवाद की भूमिका बनती है। व्यासजी ने वेदों का विभाजन किया, महाभारत की रचना की और अनेक जीवों के कल्याण के लिए बहुत कार्य किया, फिर भी उन्हें संतोष नहीं हुआ। वे सरस्वती नदी के पवित्र तट पर बैठकर विचार कर रहे थे कि उन्होंने वेद, गुरुजन और अग्नियों का सम्मान किया, महाभारत के माध्यम से वेदार्थ को खोला, फिर भी हृदय में अपूर्णता क्यों है। उन्हें लगा कि शायद उन्होंने भगवान को प्राप्त कराने वाले धर्मों का प्रायः निरूपण नहीं किया, जो परमहंसों और भगवान दोनों को प्रिय हैं। इसी समय देवर्षि नारदजी उनके आश्रम पर पहुँचे। व्यासजी तुरंत उठे और देवताओं द्वारा सम्मानित नारदजी का विधिपूर्वक पूजन किया। वास्तविक संवाद आगे शुरू होता है।
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