विस्तृत उत्तर
शास्त्र स्पष्ट रूप से कहते हैं कि पाप से मुक्ति संभव है, किंतु यह कोई बाहरी अनुष्ठान मात्र नहीं है — यह एक आंतरिक परिवर्तन की प्रक्रिया है।
सबसे पहला उपाय है — पश्चाताप। जब व्यक्ति अपने किए हुए गलत कर्म को पहचानकर उसके लिए हृदय से दुखी होता है और दृढ़ संकल्प लेता है कि भविष्य में ऐसा नहीं करेगा — तो पाप का भार हल्का होने लगता है। बिना सच्चे पश्चाताप के कोई भी अनुष्ठान निरर्थक है।
प्रायश्चित के शास्त्रीय उपाय — मनुस्मृति के अनुसार अनजाने में हुए पाप वेदाभ्यास से धुलते हैं। जानबूझकर किए गए पाप विभिन्न प्रायश्चितों से नष्ट होते हैं। इनमें यज्ञ, दान, तप, गंगास्नान, तीर्थयात्रा और भजन-कीर्तन शामिल हैं। गीता में भगवान कहते हैं — 'सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज, अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः' — अर्थात केवल मेरी शरण में आ जाओ, मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूंगा।
गहरी साधना — भक्ति, ज्ञान और सेवा से जब चित्त शुद्ध होता है, तो पाप-संस्कार धुलते जाते हैं। नाम जप, संतसंग और सद्ग्रंथों का स्वाध्याय भी पाप के प्रभाव को कम करते हैं।
ध्यान रहे — पाप का फल भोगना ही पड़ता है, किंतु प्रायश्चित उसकी तीव्रता को कम कर सकता है और भविष्य के पाप से बचाता है। केवल पाप करते रहते हुए अनुष्ठानों से शुद्धि की कामना व्यर्थ है।





