विस्तृत उत्तर
बताया गया है कि धर्म का ठीक-ठीक अनुष्ठान करने पर भी यदि मनुष्य के हृदय में भगवान की लीला-कथा के प्रति अनुराग उत्पन्न नहीं होता, तो वह केवल श्रम है। इसका अर्थ है कि बाहरी पूजा-पाठ, नियम या धार्मिक कर्म अपने आप अंतिम फल नहीं देते, जब तक उनका संबंध भगवान के प्रति प्रेम, कथा-रुचि और आंतरिक शुद्धि से न जुड़ जाए। श्रेष्ठ धर्म वही कहा गया है जिससे भगवान कृष्ण में निस्वार्थ और निरंतर भक्ति हो। भागवत या भगवद्कथा से अशुभ वासनाएँ मिटती हैं, स्थायी प्रेम होता है और मन सत्त्व में स्थित होकर निर्मल होता है। इसलिए पूजा-पाठ के बाद भी मन शांत न हो तो कारण यह हो सकता है कि उसमें भगवान की कथा और प्रेममयी भक्ति का आंतरिक अनुराग अभी जागा नहीं।
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