विस्तृत उत्तर
आत्मदेव संतान के लिये बहुत व्याकुल थे और उन्हें पुत्र ही जीवन का सार लग रहा था। इस स्थिति में संन्यासी उन्हें समझाते हैं कि संतान से सुख निश्चित नहीं होता। वे कहते हैं कि पूर्वकाल में राजा सगर और राजा अंग को भी संतान के कारण दुख भोगना पड़ा था। यह उदाहरण आत्मदेव के मोह को तोड़ने के लिये दिया गया है। संन्यासी का उद्देश्य यह बताना है कि पुत्र या परिवार में आशा बाँधना अंततः दुख दे सकता है, जबकि संन्यास और विवेक में स्थिरता अधिक सुखद है। इस प्रसंग में सगर और अंग का नाम संतान-मोह के परिणाम को समझाने के लिये आता है, न कि उनके विस्तारपूर्ण चरित्र-वर्णन के लिये।
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