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विस्तृत उत्तर
जय-विजय की कथा के अनुसार वैकुण्ठ के द्वारपाल जय और विजय को सनकादिक मुनियों का श्राप मिला था। श्राप के कारण उन्हें असुर जन्म लेने पड़े, लेकिन वे भगवान से लंबा वियोग नहीं चाहते थे। इसलिए उन्होंने तीन जन्म तक भगवान के शत्रु रूप में जन्म लेना स्वीकार किया। त्रेता युग में वे रावण और कुम्भकर्ण बने, जिनका उद्धार भगवान विष्णु ने श्रीराम अवतार में किया। इस कथा में रावण और कुम्भकर्ण केवल अधर्म के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि भगवान की लीला में आए हुए वे पार्षद हैं जिन्हें अंततः भगवान के हाथों मुक्ति मिली।
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