विस्तृत उत्तर
नारदजी बताते हैं कि पूर्वजीवन में वे चातुर्मास्य कर रहे योगियों की सेवा में नियुक्त हुए। वे बालक होने पर भी चंचलता नहीं करते थे, इंद्रियों को वश में रखते थे, खेलकूद से दूर रहते थे, कम बोलते थे और आज्ञा के अनुसार सेवा करते थे। उनके इस शील को देखकर समदर्शी मुनियों ने कृपा की। संतों की अनुमति से प्रसाद ग्रहण करने पर उनके पाप धुल गए। फिर सेवा करते-करते उनका चित्त शुद्ध हुआ और महात्माओं के भजन-पूजन में रुचि हो गई। उन्हीं संतों के अनुग्रह से वे श्रीकृष्ण की कथाएँ सुनते रहे। आगे वे कहते हैं कि वे संतों के अनुरागी, विनयी, श्रद्धावान, संयमी और आज्ञाकारी थे; जाते समय संतों ने कृपा से उन्हें गुप्त ज्ञान दिया।
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