विस्तृत उत्तर
शरीर को नश्वर बताकर कथा मनुष्य को स्थायी साधन की ओर मोड़ती है। शरीर हड्डी, नस, मांस, रक्त और चर्म से बना है, मल-मूत्र का पात्र है, रोग और शोक से घिरा है और नष्ट होने में देर नहीं लगती। गाड़ने पर कीड़े, पशु के खाने पर विष्ठा और जलाने पर भस्म उसकी गति बताई गई है। फिर प्रश्न उठता है कि ऐसे अस्थिर शरीर से स्थायी फल क्यों न प्राप्त किया जाए। उसी के बाद सप्ताह श्रवण की महिमा कही जाती है: इससे भगवान निकट प्राप्त होते हैं, दोष निवृत्त होते हैं, हृदय की गांठ खुलती है, संशय मिटते हैं और कर्म क्षीण होते हैं। इसलिए शरीर नश्वर जानकर कथा-श्रवण, मनन और मुक्ति-साधन में लगना चाहिए।
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