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विस्तृत उत्तर
महाप्रलय में ब्रह्मांडीय अवस्था पूर्णतः स्थिर थी, इसलिए कोई गति नहीं थी। आदिनाद ने पहली ध्वनि और कंपन दिया, लेकिन विष्णु की प्रथम श्वास ने उस कंपन को प्राण-शक्ति दी। श्वास के बाहर आते ही कालचक्र घूमने लगा और कारण-जल में हलचल हुई। इसी से सृष्टि में गति, परिवर्तन और जीवन का क्रम शुरू हुआ।
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