विस्तृत उत्तर
व्यासजी के पास देवर्षि नारदजी आए। नारदजी ने पहले व्यासजी से पूछा कि शरीर और मन अपने कर्म तथा चिंतन से संतुष्ट हैं या नहीं। उन्होंने महाभारत की रचना और सनातन ब्रह्मतत्त्व के विचार को स्वीकार किया, फिर भी पूछा कि व्यासजी अपने को अकृतार्थ जैसा दुखी क्यों मान रहे हैं। व्यासजी ने कहा कि सब कुछ करने पर भी हृदय संतुष्ट नहीं है और नारदजी से कारण बताने की प्रार्थना की। तब नारदजी ने कहा कि आपने भगवान के निर्मल यश का प्रायः गान नहीं किया। उन्होंने व्यासजी को भगवान की अचिंत्य लीलाओं का समाधि द्वारा स्मरण और वर्णन करने की सलाह दी। इसलिए भागवत-रचना की प्रेरणा नारदजी के उपदेश से जुड़ी है।
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