विस्तृत उत्तर
वृंदा भगवान विष्णु की परम भक्त थी। बचपन से ही वह विष्णु नाम का जप, उपवास, पूजन और ध्यान करती थी। असुर कुल में जन्म लेने पर भी उसके भीतर क्रूरता, अहंकार या आसुरी प्रवृत्ति नहीं थी। वह विष्णु को अपना आराध्य मानती थी, पर विवाह के बाद उसने पति जालंधर के प्रति भी अखंड पतिव्रत धर्म निभाया। यही द्वंद्व उसकी कथा को अत्यंत मार्मिक बनाता है। जिस भगवान की वह जीवन भर भक्त रही, उसी भगवान को धर्म-रक्षा के लिए उसके सतीत्व को भंग करना पड़ा। अंततः विष्णु ने उसे तुलसी रूप में अमर पूजनीय बना दिया।
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