ॐ नमः शिवाय  |  जय श्री राम  |  हरे कृष्ण
ग्रन्थ

पुराण परिचय(81)

पुराण परिचय पर शास्त्रीय व्याख्या, कथा, अर्थ, शिक्षाएँ और प्रश्नोत्तर — कुल 81 प्रश्न उपलब्ध हैं।

शिव महिमा

शिव जी के गले में जो सर्प है वह वासुकी है या शेषनाग?

शिव जी के गले में लिपटे सर्प का नाम वासुकी है, न कि शेषनाग। शेषनाग भगवान विष्णु के सर्प हैं। वासुकी नागों के राजा और शिव के परम भक्त हैं, जिन्हें समुद्र मंथन में भाग लेने के बाद शिव ने गले में स्थान दिया।

#वासुकी#शेषनाग#शिव नाग
शिव पुराण परिचय

शिव पुराण में कुल कितने श्लोक हैं

मूल शिव पुराण में एक लाख श्लोक थे। व्यासजी ने इसे संक्षिप्त कर 24,000 श्लोकों में प्रस्तुत किया — यही रूप आज उपलब्ध है।

#शिव पुराण#श्लोक संख्या#पुराण परिचय
शिव पुराण परिचय

शिव पुराण में कितनी संहिताएं हैं

वर्तमान में प्रचलित शिव पुराण में 7 संहिताएँ हैं। मूल शिव पुराण में 12 संहिताएँ थीं जिन्हें व्यासजी ने संक्षिप्त किया।

#शिव पुराण#संहिता#पुराण परिचय
लोक

भुवर्लोक और आधुनिक विज्ञान के वायुमंडल में क्या समानता पुराणों में बताई गई है?

भागवत पुराण कहता है कि जहाँ तक वायु बहती है और बादल दिखते हैं वहाँ तक अंतरिक्ष है। यह आधुनिक विज्ञान के वायुमंडल की निश्चित सीमा की अवधारणा से मेल खाता है।

#भुवर्लोक#आधुनिक विज्ञान#वायुमंडल
इतिहास-पुराण

रामायण किसने लिखी?

रामायण के रचयिता: महर्षि वाल्मीकि — 'आदिकवि'। 24,000 श्लोक, 7 काण्ड। राम के समकालीन — प्रत्यक्ष साक्षी कवि। पूर्व नाम रत्नाकर था। तुलसीदास की रामचरितमानस अलग (मध्यकाल, हिंदी) — स्मृति ग्रंथ। वाल्मीकि रामायण ही मूल प्रामाणिक।

#रामायण#वाल्मीकि#आदिकवि
इतिहास-पुराण

महाभारत किसने लिखा?

महाभारत के रचयिता: महर्षि वेदव्यास (कृष्णद्वैपायन)। गणेश ने लेखनी से लिखा — परंपरागत आख्यान। एक लाख श्लोक, 18 पर्व। भगवद्गीता इसी का अंश। 'पंचम वेद' कहलाता है। व्यास ने 18 पुराण और ब्रह्मसूत्र भी रचे।

#महाभारत#वेदव्यास#गणेश
शास्त्र ज्ञान

पुराण कितने हैं?

18 महापुराण (+ 18 उप-पुराण)। महर्षि वेदव्यास-संकलित। सबसे बड़ा: स्कंद पुराण (81,000 श्लोक)। सर्वप्रचलित: भागवत पुराण (18,000 श्लोक, 12 स्कंध)। त्रिमूर्ति (ब्रह्म-विष्णु-शिव) को 6-6-6 पुराण समर्पित। गरुड़ पुराण — मृत्यु-संस्कार पाठ।

#पुराण#18 महापुराण#वेदव्यास
शास्त्र ज्ञान

वेद और पुराण में क्या अंतर है?

वेद = श्रुति, अपौरुषेय, सर्वोच्च प्रमाण, मंत्रात्मक, कठिन। पुराण = स्मृति, व्यास-संकलित, वेद-ज्ञान को कथाओं में सरल करके प्रस्तुत। वेद सूत्र रूप में, पुराण विस्तार रूप में। पुराण वेद के पूरक हैं, प्रतिस्थापन नहीं। दोनों का एक-दूसरे के बिना पूर्ण बोध कठिन।

#वेद#पुराण#श्रुति
अस्त्र शस्त्र

दिव्यास्त्र कैसे प्राप्त होते थे पुराणों में?

दिव्यास्त्र तीन प्रकार से मिलते थे — (1) देव-तपस्या से वरदान (2) सिद्ध गुरु से शिक्षा (3) युद्ध में पराक्रम पर देव वरदान। पात्रता, पवित्रता और एकाग्रता आवश्यक थी।

#दिव्यास्त्र प्राप्ति#तपस्या#गुरु शिक्षा
श्रीमद्भागवत

पुराण को पाँचवाँ वेद क्यों कहते हैं?

इतिहास और पुराण को पाँचवाँ वेद कहा गया है; आगे महाभारत द्वारा वेद का अर्थ आम लोगों के लिए खोलने की बात आती है।

#पुराण#पाँचवाँ वेद#इतिहास
श्रीमद्भागवत

सूतजी को पुराणों का ज्ञाता क्यों माना गया?

क्योंकि उन्होंने इतिहास, पुराण और धर्मशास्त्रों का अध्ययन और व्याख्या की थी तथा व्यासादि मुनियों के ज्ञान को जानते थे।

#सूतजी#पुराण#धर्मशास्त्र
पुराण कथा

शिलाद मुनि ने किस प्रकार के पुत्र की प्रार्थना की?

शिलाद मुनि ने अयोनिज पुत्र के लिए प्रार्थना की।

#शिलाद#इन्द्र#अयोनिज पुत्र
पुराण परिचय

व्यासजी ने वैवस्वत मन्वन्तर में कितने श्लोकों में वर्णन किया?

वैवस्वत मन्वन्तर में श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजी ने लिङ्गपुराण का वर्णन ग्यारह हजार श्लोकों में किया।

#वैवस्वत मन्वन्तर#व्यासजी#ग्यारह हजार श्लोक
पुराण परिचय

एक करोड़ श्लोकों वाला कौन सा पुराण बताया गया है?

सौ करोड़ विस्तारवाले पुराणसमुच्चय में एक करोड़ श्लोकोंवाला पुराण लिङ्गपुराण बताया गया है।

#एक करोड़ श्लोक#लिङ्गपुराण#पुराण श्लोक संख्या
पुराण परिचय

सूतजी ने व्यासजी से कौन सा पुराण सुना?

सूतजी ने लिङ्गपुराण को व्यासजी से सुना था।

#सूतजी#व्यासजी#लिङ्गपुराण
पुराण परिचय

ग्यारहवाँ पुराण कौन सा है?

अठारह पुराणों में ग्यारहवाँ पुराण लिङ्गपुराण कहा गया है।

#ग्यारहवाँ पुराण#अठारह पुराण#लिङ्गपुराण
पुराण परिचय

पुराणों को हर द्वापरयुग में कौन विभाजित करता है?

प्रत्येक द्वापरयुग में बृहद् पुराणसंहिता को व्यासजी अठारह पुराणों के रूप में विभक्त करते हैं।

#पुराण#द्वापरयुग#व्यासजी
पुराण परिचय

ईशानकल्प में किस कथा का आधार बताया गया है?

ईशानकल्प में लिङ्ग के प्रादुर्भाव आदि से सम्बद्ध वृत्तान्तों को आधार बताया गया है।

#ईशानकल्प#लिङ्ग प्रादुर्भाव#ब्रह्मा
पुराण परिचय

ब्रह्मा ने सबसे पहले किस पुराण की उद्भावना की?

महात्मा ब्रह्मा ने ईशानकल्प के लिङ्ग-प्रादुर्भाव आदि वृत्तान्तों के आधार पर श्रेष्ठ लिङ्गपुराण की उद्भावना की।

#ब्रह्मा#लिङ्गपुराण#ईशानकल्प
पुराण कथा

कथा शुरू करने से पहले सूतजी ने किसे प्रणाम किया?

सूतजी ने शिव, ब्रह्मा, विष्णु और मुनीश्वर व्यासजी को नमस्कार करके कथा आरंभ की।

#सूतजी#शिव#ब्रह्मा
पुराण कथा

ऋषियों ने सूतजी से क्या सुनना चाहा?

ऋषियों ने सूतजी से लिङ्गमाहात्म्ययुक्त पुण्यदायिनी पुराणसंहिता सुनना चाहा।

#ऋषि#सूतजी#पुराणसंहिता
पुराण कथा

सूतजी और व्यासजी का क्या संबंध था?

सूतजी ने कृष्णद्वैपायन व्यासजी से पुराणसंहिता प्राप्त की थी।

#सूतजी#व्यासजी#कृष्णद्वैपायन
पुराण कथा

सूतजी कौन थे?

सूतजी पुराणों के ज्ञाता, परम बुद्धिमान और व्यासजी से पुराणसंहिता प्राप्त करने वाले पौराणिक थे।

#सूतजी#व्यासजी#पुराण
पुराण कथा

नैमिषारण्य क्या है?

नैमिषारण्य वह तीर्थ है जहाँ ऋषि रहते थे और जहाँ नारदजी तथा सूतजी पहुँचे।

#नैमिषारण्य#ऋषि#नारद
लोक

भृगु पत्नी वध की कथा किस ग्रंथ में आती है?

यह कथा मत्स्य पुराण, पद्म पुराण, देवी भागवत और रामायण में संदर्भित है।

#भृगु पत्नी वध#ग्रंथ#पुराण
लोक

ब्रह्मा और शिव जल्दी वरदान क्यों देते हैं?

पुराणों में ब्रह्मा और शिव तपस्या से शीघ्र प्रसन्न होकर सकाम वरदान देने वाले देवों के रूप में वर्णित हैं।

#ब्रह्मा शिव#वरदान#पुराण
लोक

समुद्र मंथन कब हुआ था?

समुद्र मंथन पुराणों के अनुसार चाक्षुष मन्वन्तर में हुआ था।

#समुद्र मंथन समय#चाक्षुष मन्वन्तर#पुराण
लोक

रावण असल में कौन था पुराणों के अनुसार

पुराणों के अनुसार रावण जय नामक वैकुण्ठ द्वारपाल का श्रापित जन्म था।

#रावण#पुराण#जय विजय
पुराण माहात्म्य

द्वितीया श्राद्ध और शिव-सायुज्य का क्या सम्बन्ध है?

द्वितीया श्राद्ध और शिव-सायुज्य का सम्बन्ध प्रत्यक्ष है। सायुज्य का अर्थ है भगवान के साथ एक होना। स्कन्द पुराण के अनुसार द्वितीया श्राद्ध भक्ति से करने पर श्राद्धकर्ता मृत्यु के बाद कैलास प्राप्त करता है और शिव के गणों के साथ मोद पाता है। यह शिव-सायुज्य के निकट की अवस्था है। पितृ-भक्ति शिव-प्राप्ति का मार्ग है।

#शिव सायुज्य#मुक्ति#कैलास
पुराण माहात्म्य

महालय का श्राद्ध न करने वाले का क्या होता है?

महालय का श्राद्ध न करने वाले के तीन प्रमुख दुष्परिणाम होते हैं। पहला, भगवान शम्भु यानी शिव कुपित होकर ब्रह्म-वर्चस्व यानी तेज और पुण्य का सर्वथा नाश करते हैं। दूसरा, मृत्यु के बाद रौरव और कालसूत्र नामक भयंकर नरकों की यातना मिलती है। तीसरा, इस लोक में भी पितृ दोष, रोग, दरिद्रता, और परिवार में कलह आती है।

#महालय श्राद्ध#न करने का दण्ड#पितृ दोष
पुराण माहात्म्य

क्या भगवान शम्भु द्वितीया न करने पर कुपित होते हैं?

हाँ, भगवान शम्भु यानी शिव द्वितीया श्राद्ध न करने पर कुपित होते हैं। स्कन्द पुराण के नागर खण्ड में स्पष्ट है कि जो मनुष्य द्वितीया पर अधिकार होने पर भी महालय श्राद्ध नहीं करता, कुपित शम्भु उसके ब्रह्म-वर्चस्व का सर्वथा नाश कर देते हैं और मृत्यु के बाद रौरव-कालसूत्र नरक प्रदान करते हैं। शम्भु यानी सुख देने वाले, कुपित होकर दुःख भी देते हैं।

#शम्भु क्रोध#शिव कुपित#द्वितीया उल्लंघन
पुराण माहात्म्य

रौरव और कालसूत्र नरक क्या हैं?

रौरव और कालसूत्र दो भयंकर नरक हैं। रौरव में रौरव सर्पों का काटना और अग्नि की जलन होती है। कालसूत्र में काल के धागों से बाँधकर यातना दी जाती है। स्कन्द पुराण के नागर खण्ड के अनुसार जो व्यक्ति द्वितीया तिथि पर अधिकार होने पर भी महालय का श्राद्ध नहीं करता, उसे मृत्यु के बाद इन दोनों भयंकर नरकों की यातना भोगनी पड़ती है।

#रौरव नरक#कालसूत्र नरक#नरक यातना
पुराण माहात्म्य

ब्रह्म-वर्चस्व क्या है?

ब्रह्म-वर्चस्व वह दिव्य आत्मिक तेज है जो व्यक्ति को जीवन में सफलता, स्वास्थ्य, यश, और पुण्य देता है। ब्रह्म का अर्थ है परम और वर्चस् का अर्थ है तेज। यह अदृश्य परंतु शक्तिशाली आत्मिक ऊर्जा है। स्कन्द पुराण के अनुसार जो व्यक्ति द्वितीया श्राद्ध नहीं करता, भगवान शिव उसके ब्रह्म-वर्चस्व यानी तेज और पुण्य का सर्वथा नाश कर देते हैं।

#ब्रह्म वर्चस्व#आत्मिक तेज#पुण्य शक्ति
पुराण माहात्म्य

द्वितीया श्राद्ध न करने से क्या होता है?

द्वितीया श्राद्ध न करने पर तीन दुष्परिणाम होते हैं। पहला, भगवान शम्भु यानी शिव कुपित होते हैं। दूसरा, उस व्यक्ति के ब्रह्म-वर्चस्व यानी तेज और पुण्य का सर्वथा नाश हो जाता है। तीसरा, मृत्यु के बाद रौरव और कालसूत्र नामक भयंकर नरकों की यातना भोगनी पड़ती है। स्कन्द पुराण नागर खण्ड अध्याय 230 में यह स्पष्ट वर्णन है।

#श्राद्ध न करना#ब्रह्म वर्चस्व नाश#रौरव नरक
पुराण माहात्म्य

विपुल सम्पदा क्या होती है?

विपुल सम्पदा का अर्थ है प्रचुर और असीमित समृद्धि। विपुल का अर्थ है असीमित, और सम्पदा का अर्थ है ऐश्वर्य। स्कन्द पुराण के नागर खण्ड के अनुसार द्वितीया श्राद्ध से प्रसन्न होकर भगवान महेश्वर यानी शिव इस लोक में विपुल सम्पदा प्रदान करते हैं। इसमें भौतिक धन, परिवारिक सुख, स्वास्थ्य, यश, और विद्या - जीवन के हर पहलू में समृद्धि शामिल है।

#विपुल सम्पदा#अपार समृद्धि#स्कन्द पुराण फल
पुराण माहात्म्य

क्या द्वितीया श्राद्ध से शिव गणों का साथ मिलता है?

हाँ, द्वितीया श्राद्ध से शिव गणों का साथ मिलता है। स्कन्द पुराण के नागर खण्ड के अनुसार श्राद्धकर्ता मृत्यु के बाद कैलास धाम प्राप्त करता है और शिवेन सह मोदते यानी शिव के गणों के साथ परम मोद यानी आनन्द पाता है। शिव के दिव्य गणों का साहचर्य परम भक्त के लिए सर्वोच्च पारलौकिक प्राप्ति है। यह द्वितीया श्राद्ध की विशिष्ट महिमा है।

#शिव गण#कैलास आनन्द#द्वितीया फल
पुराण माहात्म्य

कैलास धाम क्या है?

कैलास धाम भगवान शिव का परम निवास है, जो हिमालय में स्थित कैलास पर्वत पर है। शैव परम्परा में यह सर्वोच्च धाम है। स्कन्द पुराण के अनुसार द्वितीया श्राद्ध करने वाला श्राद्धकर्ता मृत्यु के बाद निश्चित रूप से कैलास प्राप्त करता है, शिव के गणों के साथ मोद यानी आनन्द पाता है, और प्रसन्न भगवान महेश्वर इस लोक में भी विपुल सम्पदा देते हैं।

#कैलास धाम#शिव निवास#परम धाम
पुराण माहात्म्य

द्वितीया श्राद्ध से शिव क्यों प्रसन्न होते हैं?

द्वितीया श्राद्ध से शिव इसलिए प्रसन्न होते हैं क्योंकि शिव महाकाल हैं यानी मृत्यु और समय के परम देवता। यमराज शिव के अधीन हैं, और द्वितीया तिथि पर यमराज का विशेष आधिपत्य रहता है। जब कर्ता भक्ति से पितरों का श्राद्ध करता है, तो यमराज प्रसन्न होते हैं और शिव भी प्रसन्न होते हैं। भक्तिपूर्वक पितृ-सेवा शिव की सेवा के समान है।

#शिव प्रसन्नता#द्वितीया श्राद्ध#महाकाल
पुराण माहात्म्य

भवानीपति कौन हैं?

भवानीपति भगवान शिव का एक नाम है, जिसका अर्थ है भवानी यानी देवी पार्वती के पति। भवानी का अर्थ है पार्वती, और पति का अर्थ है स्वामी। स्कन्द पुराण के नागर खण्ड में कहा गया है कि द्वितीया श्राद्ध करने से भगवान भवानीपतिरीश्वरः यानी भवानी के पति ईश्वर शिव अत्यंत प्रसन्न होते हैं, और श्राद्धकर्ता को कैलास धाम तथा विपुल सम्पदा प्रदान करते हैं।

#भवानीपति#भगवान शिव#पार्वती पति
पुराण माहात्म्य

द्वितीया श्राद्ध से कौन सा लोक मिलता है?

द्वितीया श्राद्ध से कैलास धाम की प्राप्ति होती है। स्कन्द पुराण के नागर खण्ड के अनुसार जो मनुष्य महालय की द्वितीया को भक्ति से श्राद्ध करता है, वह मृत्यु के बाद कैलास धाम प्राप्त करता है और भगवान शिव के गणों के साथ आनन्द पाता है। इस लोक में भी भगवान महेश्वर विपुल सम्पदा प्रदान करते हैं। यह द्वितीया श्राद्ध का सर्वोच्च पारलौकिक फल है।

#कैलास प्राप्ति#द्वितीया फल#परलोक
पुराण माहात्म्य

स्कन्द पुराण के नागर खण्ड में द्वितीया की क्या महिमा है?

स्कन्द पुराण के नागर खण्ड अध्याय 230 में महर्षि व्यास ने महालय की द्वितीया श्राद्ध की महिमा गाई है। जो मनुष्य द्वितीया को पूर्ण भक्ति से श्राद्ध करता है, उससे भगवान भवानीपति महेश्वर यानी शिव अत्यंत प्रसन्न होते हैं। वह श्राद्धकर्ता मृत्यु के बाद कैलास धाम प्राप्त करता है और शिव गणों के साथ आनन्द पाता है। इस लोक में भी विपुल सम्पदा मिलती है।

#स्कन्द पुराण#नागर खण्ड#द्वितीया महिमा
लोक

आदित्य किसके पुत्र माने गए हैं?

आदित्य महर्षि कश्यप और अदिति के 12 पुत्र माने गए हैं।

#आदित्य#कश्यप#अदिति
लोक

पिशाचों की उत्पत्ति कैसे हुई?

एक मत में पिशाच ब्रह्मा की रचना हैं, दूसरे मत में वे कश्यप और क्रोधवशा या पिशाचा की संतान माने गए हैं।

#पिशाच उत्पत्ति#ब्रह्मा#कश्यप
लोक

अलग-अलग पुराणों में पाताल लोकों के नाम अलग क्यों हैं?

पुराणों में नामों का अंतर कल्प, मन्वन्तर और वर्णन शैली के भेद से है, पर सात अधोलोकों की संरचना एकमत से स्वीकार है।

#पाताल लोक#पुराण#अधोलोक
लोक

अलग-अलग पुराणों में महातल का स्थान क्या है?

अलग-अलग पुराणों में महातल लगभग सर्वसम्मति से पांचवें पाताल के रूप में माना गया है।

#पुराण#महातल स्थान#पांचवां पाताल
लोक

तलातल को गभस्तिमत् क्यों कहा गया है?

विष्णु और ब्रह्माण्ड पुराण में तलातल को गभस्तिमत् नाम से संबोधित किया गया है।

#तलातल#गभस्तिमत्#पीली भूमि
लोक

योजन क्या होता है?

योजन प्राचीन दूरी मापने की इकाई है, जिससे लोकों की दूरी बताई गई है।

#योजन#दूरी#मापन
लोक

जनलोक की दूरी कितनी बताई गई है?

जनलोक महर्लोक से दो करोड़ योजन ऊपर स्थित है।

#जनलोक दूरी#महर्लोक#योजन
लोक

विभिन्न पुराणों में तपोलोक के वर्णन अलग होते हुए भी उनकी मूल सहमति क्या है?

सभी पुराण तपोलोक को पवित्र, वैराग्यपूर्ण, तपस्वियों और वैराज देवगणों का उच्च दिव्य लोक मानते हैं।

#पुराण#तपोलोक#मूल सहमति
लोक

पुराणों में तपोलोक की दूरी अलग-अलग क्यों मिलती है?

दूरी का अंतर कल्प-भेद और ब्रह्मांड-भेद से समझा जाता है; प्रचलित मत आठ करोड़ योजन का है।

#तपोलोक दूरी#पुराण#कल्प-भेद
सभी ग्रन्थ
अन्य ग्रन्थ देखें

रामायण, महाभारत, गीता, पुराण, वेद, उपनिषद — सभी ग्रन्थों की सूची।

टैग खोज
विषय अनुसार खोजें

गरुड़ पुराण, बालकाण्ड, मंत्र, साधना — टैग द्वारा प्रश्न खोजें।