विस्तृत उत्तर
श्वेताश्वतर उपनिषद के अत्यंत महत्त्वपूर्ण श्लोक में कहा गया है:
अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम्। विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति।।
अर्थ: जो अनादि (जिसका कोई आरंभ नहीं) और अनंत (जिसका कोई अंत नहीं) है, जो इस विषम और जटिल विश्व प्रपंच के मध्य गूढ़ रूप से विद्यमान है, जो अनेक रूपों को धारण कर इस संपूर्ण विश्व का स्रष्टा है, और जो इस विश्व को चारों ओर से आवेष्टित (envelop) किए हुए है, उस परम देव 'शिव' को तत्त्व से जानकर जीव परम शांति (मोक्ष) को प्राप्त करता है।
यह वैदिक उद्घोष अकाट्य रूप से प्रमाणित करता है कि शिव कोई सीमित सत्ता नहीं, अपितु स्वयं सर्वव्यापक परमेश्वर (परब्रह्म) हैं।





