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दार्शनिक महत्त्व और उपनिषद⏱ 1 मिनट पठन

'अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये' श्लोक का क्या अर्थ है?

श्वेताश्वतर उपनिषद के अत्यंत महत्त्वपूर्ण श्लोक में कहा गया है: 'अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम्।

संक्षिप्त उत्तर

श्वेताश्वतर उपनिषद श्लोक: जो अनादि-अनंत, विश्व के मध्य गूढ़ रूप से विद्यमान, अनेक रूपों वाला विश्व-स्रष्टा और विश्व को चारों ओर से आवेष्टित करने वाला है — उस 'शिव' को जानकर जीव परम शांति (मोक्ष) पाता है।

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विस्तृत उत्तर

श्वेताश्वतर उपनिषद के अत्यंत महत्त्वपूर्ण श्लोक में कहा गया है:

अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम्। विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति।।

अर्थ: जो अनादि (जिसका कोई आरंभ नहीं) और अनंत (जिसका कोई अंत नहीं) है, जो इस विषम और जटिल विश्व प्रपंच के मध्य गूढ़ रूप से विद्यमान है, जो अनेक रूपों को धारण कर इस संपूर्ण विश्व का स्रष्टा है, और जो इस विश्व को चारों ओर से आवेष्टित (envelop) किए हुए है, उस परम देव 'शिव' को तत्त्व से जानकर जीव परम शांति (मोक्ष) को प्राप्त करता है।

यह वैदिक उद्घोष अकाट्य रूप से प्रमाणित करता है कि शिव कोई सीमित सत्ता नहीं, अपितु स्वयं सर्वव्यापक परमेश्वर (परब्रह्म) हैं।

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'अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये' श्लोक का क्या अर्थ है को संदर्भ सहित समझें

'अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये' श्लोक का क्या अर्थ है का सबसे सीधा सार यह है: श्वेताश्वतर उपनिषद श्लोक: जो अनादि-अनंत, विश्व के मध्य गूढ़ रूप से विद्यमान, अनेक रूपों वाला विश्व-स्रष्टा और विश्व को चारों ओर से आवेष्टित करने वाला है — उस...

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