विस्तृत उत्तर
भगवान को प्रसन्न करने का मार्ग स्पष्ट रूप से बताया गया है। मनुष्य अपने-अपने वर्ण और आश्रम के अनुसार जो धर्म करता है, उसकी पूर्ण सिद्धि इसी में है कि भगवान प्रसन्न हों। इसलिए एकाग्र मन से भक्तवत्सल भगवान का नित्य-निरंतर श्रवण, कीर्तन, ध्यान और आराधन करना चाहिए। इसका अर्थ है कि धर्म केवल सामाजिक पहचान या कर्मकांड तक सीमित न रहे; उसका लक्ष्य भगवान की प्रसन्नता हो। श्रवण से भगवान की कथा सुनी जाती है, कीर्तन से उनका नाम और यश गाया जाता है, ध्यान से मन उन्हीं पर स्थिर होता है और आराधन से जीवन पूजा-भाव में ढलता है। इसी समर्पित, एकाग्र और निरंतर भगवत-स्मरण से भगवान को प्रसन्न करने की दिशा बनती है।
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