विस्तृत उत्तर
भागवत कथा के बाद प्रसाद और तुलसी देने का विधान समापन पूजा से जुड़ा है। सप्ताह पूरा होने पर श्रोता पहले भागवत पुस्तक और वक्ता की भक्ति से पूजा करता है। उसके बाद वक्ता श्रोताओं को प्रसाद, तुलसी और प्रसादमालाएँ देता है। फिर मृदंग और झाँझ की मनोहर ध्वनि के साथ सुंदर कीर्तन होता है। प्रसाद और तुलसी यहाँ कथा-श्रवण के पुण्य, भगवान की कृपा और वैष्णव-समागम की स्मृति के रूप में मिलते हैं। यह केवल वितरण नहीं, बल्कि कथा से प्राप्त भगवत्-संबंध को श्रोता के हाथ में देने जैसा है। इसके बाद जयघोष, नमस्कार, शंखध्वनि और दान का क्रम आता है।
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