विस्तृत उत्तर
भागवत कथा से भक्ति जागने की प्रक्रिया कथा-रस और श्रवण से समझाई गई है। प्रारंभ में सनकादि नारदजी से कहते हैं कि जहाँ श्रीमद्भागवत कथा होती है, वहाँ भक्ति, ज्ञान और वैराग्य अपने-आप पहुँच जाते हैं। कथा के शब्द कान में पड़ने से ये तीनों तरुण हो जाते हैं। आगे जब सप्ताह श्रवण की महिमा कही जा रही थी, तब सभा में भक्ति अपने दोनों पुत्रों के साथ तरुण अवस्था में प्रकट हुई और भगवान के नामों का उच्चारण करने लगी। सनकादि ने बताया कि भक्ति अभी-अभी कथा के अर्थ से निकली है। भक्ति स्वयं कहती है कि कलियुग में वह नष्टप्राय हो गई थी, पर कथामृत से सिंचित होकर फिर पुष्ट हुई।
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