विस्तृत उत्तर
भागवत सप्ताह का उद्यापन कथा-व्रत पूर्ण होने के बाद किया जाता है। विशेष फल की इच्छा हो तो जन्माष्टमी व्रत की तरह उद्यापन बताया गया है। सप्ताह समाप्त होने पर श्रोता को अत्यंत भक्ति से भागवत पुस्तक और वक्ता की पूजा करनी चाहिए। वक्ता श्रोताओं को प्रसाद, तुलसी और प्रसादमालाएँ दे। मृदंग और झाँझ के साथ सुंदर कीर्तन हो, जय-जयकार, नमस्कार और शंखध्वनि कराई जाए। ब्राह्मणों और याचकों को धन और अन्न दिया जाए। विरक्त श्रोता हो तो दूसरे दिन गीता पाठ करे; गृहस्थ हो तो हवन करे। हवन न हो सके तो हवन सामग्री दान और विष्णुसहस्रनाम पाठ बताया गया है। बारह ब्राह्मणों को खीर-मधु आदि खिलाना, गौ-सुवर्ण दान और सामर्थ्य हो तो भागवत पुस्तक को सोने के सिंहासन पर रखकर आचार्य को दान करना भी कहा गया है।
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