विस्तृत उत्तर
भागवत सप्ताह में उपवास को विकल्प के रूप में बताया गया है, अनिवार्य नियम के रूप में नहीं। यदि श्रोता में शक्ति हो तो सात दिन निराहार रहकर कथा सुन सकता है। वह घी या दूध पीकर भी श्रवण कर सकता है। फलाहार या एक समय भोजन भी स्वीकार है। निर्णायक बात यह है कि जो नियम सुखपूर्वक निभ सके और कथा श्रवण में सहायक हो, वही लेना चाहिए। पाठ स्पष्ट कहता है कि यदि उपवास कथा सुनने में बाधा पहुँचाए, तो वह किसी काम का नहीं; उस स्थिति में भोजन करना श्रेष्ठ है। इसलिए भागवत सप्ताह में आहार का उद्देश्य शरीर को श्रवणयोग्य रखना है, न कि शरीर को ऐसा कष्ट देना जिससे कथा पर ध्यान ही न रहे।
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