विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवत के वर्णन में शोक, मोह और भय का मूल कारण माया से उत्पन्न भ्रम है। जीव तीन गुणों से परे होते हुए भी अपने को गुणमय मानता है और इसी गलत मान्यता से अनर्थों को भोगता है। वेदव्यासजी ने भक्ति-योग से परमात्मा और उनकी माया को देखा और समझा कि इन अनर्थों की शांति का सीधा साधन भगवान का भक्ति-योग है। संसार के लोग इस उपाय को नहीं जानते थे, इसलिए उन्होंने श्रीमद्भागवत की रचना की। जब यह भागवत सुनी जाती है, तो पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण में परम प्रेममयी भक्ति उत्पन्न होती है। वही भक्ति जीव के भीतर से शोक, मोह और भय को हटाती है, क्योंकि वह जीव को माया के भ्रम से भगवान के आश्रय में ले जाती है।
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