विस्तृत उत्तर
नारदजी कहते हैं कि जो शास्त्र-विहित कर्म भगवान की प्रसन्नता के लिए किए जाते हैं, उन्हीं से भक्ति योग से संयुक्त ज्ञान प्राप्त होता है। यह ज्ञान केवल कर्मकांड या बौद्धिक विचार नहीं है; यह भगवान की संतुष्टि, स्मरण, नाम-कीर्तन और समर्पण से जुड़ा है। आगे नारदजी अपने अनुभव में बताते हैं कि भगवान की आज्ञा का पालन करने पर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें आत्मज्ञान, ऐश्वर्य और अपनी भावरूपा प्रेमाभक्ति दी। इससे स्पष्ट होता है कि भक्ति योग वाला ज्ञान भगवान से अलग खड़ा ज्ञान नहीं है। वह भगवान की प्रसन्नता के लिए कर्म करने, उनके नाम-गुण का स्मरण करने और उनके प्रति प्रेमपूर्ण भक्ति में प्रवेश करने से प्रकट होता है।
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