विस्तृत उत्तर
सनातन धर्म में मनुष्य जीवन के चार सर्वोच्च लक्ष्यों को 'पुरुषार्थ' कहा जाता है। 'पुरुषार्थ' का अर्थ है — विवेकशील मनुष्य के द्वारा किया गया सार्थक प्रयास। ये चार पुरुषार्थ हैं — धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इन्हें 'पुरुषार्थचतुष्टय' भी कहते हैं।
धर्म — इसका शाब्दिक अर्थ है 'धारण करना'। जो समाज, व्यक्ति और प्रकृति को संतुलन में बनाए रखे, वही धर्म है। धर्म केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि नैतिकता, सत्य, न्याय और कर्तव्य का पालन है। यह शेष तीनों पुरुषार्थों का आधार है।
अर्थ — इसका तात्पर्य धन, संसाधन और भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति से है। अन्न, वस्त्र, शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार — ये सब अर्थ के अंतर्गत आते हैं। चाणक्य ने कहा है 'अर्थो हि धर्मस्य मूलम्' — अर्थात धर्म को चलाने के लिए भी अर्थ की आवश्यकता होती है। किंतु यह अर्थ धर्म की सीमा में रहकर अर्जित किया जाना चाहिए।
काम — इसका अर्थ है मनुष्य की समस्त कामनाएँ, इच्छाएँ, सौंदर्यबोध, प्रेम और सृजनात्मकता। काम केवल शारीरिक नहीं, इसमें कला, संगीत, संवेदना और जीवन का आनंद भी समाहित है। जब काम धर्म की मर्यादा में रहता है, तो वह पुरुषार्थ कहलाता है; अन्यथा पतन का कारण बनता है।
मोक्ष — यह जन्म-मरण के चक्र से पूर्ण मुक्ति की अवस्था है। शास्त्रों में मोक्ष को पुरुषार्थों में सर्वोच्च माना गया है। यह कोई स्थान नहीं, बल्कि चेतना की वह अवस्था है जहाँ आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान लेती है।
इन चारों में धर्म नींव है और मोक्ष शिखर; अर्थ और काम बीच के आधार हैं। तीनों को सम्यक रूप से साधने पर ही मोक्ष का मार्ग सुगम होता है।





