विस्तृत उत्तर
कथा और कीर्तन से प्रसन्न होकर भगवान ने भक्तों से वर माँगने को कहा। तब सबने प्रेम से भगवान से प्रार्थना की कि भविष्य में जहाँ-कहीं सप्ताह कथा हो, वहाँ आप अपने पार्षदों सहित अवश्य पधारें। यह उनका मनोरथ था। भगवान ने ‘तथास्तु’ कहकर उसे स्वीकार किया और अंतर्धान हो गए। इस वचन से भागवत सप्ताह का माहात्म्य और बढ़ जाता है। कथा केवल मानव आयोजन नहीं रहती; भक्तों की प्रार्थना से वह भगवान के आगमन का स्थल मानी जाती है। यह भी स्पष्ट है कि भगवान कथा और कीर्तन से प्रसन्न हुए थे, और भक्ति-भाव ने उन्हें वश में कर लिया था। इसलिए जहाँ श्रद्धा से भागवत सप्ताह होता है, वहाँ भगवान की कृपा और उपस्थिति का भाव जोड़ा गया है।
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