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विस्तृत उत्तर
जय और विजय भगवान विष्णु के वैकुण्ठ धाम के द्वारपाल थे। वे अत्यंत तेजस्वी, शक्तिशाली और भगवान के निकट पार्षद माने जाते हैं। उनका कार्य वैकुण्ठ के प्रवेश द्वारों की रक्षा करना था, विशेषकर उस अंतरंग क्षेत्र का जहाँ भगवान नारायण विराजमान हैं। एक बार सनकादिक मुनियों को रोकने के कारण उन्हें श्राप मिला और वे भौतिक जगत में असुर रूप में जन्म लेने के लिए बाध्य हुए। उनकी कथा भगवान की लीला, श्राप, वैर-भक्ति और अंततः मुक्ति से जुड़ी हुई है।
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