विस्तृत उत्तर
जीवन का स्थायी फल पाने की बात शरीर की नश्वरता के वर्णन के साथ आती है। कहा गया है कि शरीर अस्थिर है, रोग और शोक से भरा है, और उसका अंत कीड़े, विष्ठा या भस्म के रूप में होता है। सुबह पकाया अन्न शाम तक बिगड़ जाता है, तो उसी अन्न के रस से पले शरीर की नित्यता कैसी हो सकती है। ऐसे अस्थिर शरीर से अविनाशी फल क्यों न कमाया जाए। आगे बताया गया कि सप्ताह श्रवण से भगवान शीघ्र प्राप्त होते हैं, हृदय की गांठ खुलती है, संशय मिटते हैं, कर्म क्षीण होते हैं और कथा हृदय में स्थित हो जाए तो मुक्ति निश्चित मानी जाती है। इसलिए स्थायी फल शरीर-सुख में नहीं, भगवत कथा और मुक्ति-साधन में बताया गया है।
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