विस्तृत उत्तर
भगवान के तीसरे अवतार को देवर्षि नारद के रूप में बताया गया है। ऋषियों की सृष्टि में भगवान ने नारद रूप धारण किया और सात्वत तंत्र का उपदेश किया, जिसे हिंदी व्याख्या में नारद-पांचरात्र कहा गया है। इस तंत्र में बताया गया है कि कर्मों के द्वारा किस प्रकार कर्मबंधन से मुक्ति मिलती है। यह बात महत्वपूर्ण है क्योंकि सामान्य कर्म जीव को बाँधते हैं, पर भगवान से संबद्ध मार्ग में कर्म ही बंधन काटने का साधन बन सकते हैं। पाठ यहाँ नारदजी की अन्य कथाएँ नहीं देता; उनका मुख्य कार्य सात्वत तंत्र का उपदेश और कर्मबंधन से मुक्ति का मार्ग बताना है।
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