विस्तृत उत्तर
आत्मदेव का संतान-दुख इतना बढ़ता है कि वे आयु ढलने पर अनेक पुण्यकर्म आरंभ करते हैं। वे दीन-दुखियों को गौ, भूमि, सोना और वस्त्र आदि दान देते हैं। पाठ में कहा गया है कि इस प्रकार धर्ममार्ग में उन्होंने अपना आधा धन लगा दिया। फिर भी उन्हें पुत्र या पुत्री किसी का भी मुख देखने को नहीं मिला। यही असफलता उन्हें अत्यंत चिंतित बना देती है। इस प्रसंग से कथा यह दिखाती है कि आत्मदेव ने संतान पाने के लिये केवल इच्छा नहीं की, बल्कि धर्मकर्म और दान के माध्यम से बहुत प्रयास भी किया, पर उनका प्रारब्ध पुत्र-प्राप्ति के विरुद्ध था।
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