विस्तृत उत्तर
संन्यासी आत्मदेव को फल देते समय केवल पुत्र-प्राप्ति का आश्वासन नहीं देते, बल्कि पत्नी के लिये नियम भी बताते हैं। वे कहते हैं कि आत्मदेव अपनी पत्नी को वह फल खिला दें, तब उसे पुत्र होगा। पर उस स्त्री को एक वर्ष तक सत्य, शौच, दया, दान और एक समय एक ही अन्न खाने का नियम रखना चाहिए। यदि वह ऐसा करेगी तो पुत्र बहुत शुद्ध स्वभाव वाला होगा। इस प्रसंग में फल किसी यांत्रिक चमत्कार की तरह नहीं रखा गया है; उसके साथ आचरण की शुद्धि और नियम का महत्व भी जोड़ा गया है। धुंधुली बाद में इन्हीं नियमों और गर्भ के कष्टों से डरकर फल खाने से बचती है।
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