विस्तृत उत्तर
राजा जनक ने अयोध्या में दूत इसलिये भेजे क्योंकि श्रीरामजी ने शिवजी का धनुष तोड़ दिया था और सीताजी ने उन्हें जयमाला पहना दी थी। अब विवाह की औपचारिक प्रक्रिया के लिये राजा दशरथ को बारात लेकर जनकपुर आना था।
विश्वामित्रजी ने जनक से कहा — शीघ्र दूत भेजो। दूत ने अयोध्या पहुँचकर दशरथ को सारा वृत्तान्त सुनाया — धनुष भंग, जयमाला, और विवाह की तिथि।
गुरु वसिष्ठजी ने दशरथ से कहा — 'तुम्ह ते अधिक पुन्य बड़ काकें। राजन राम सरिस सुत जाकें' — तुमसे अधिक पुण्य किसका होगा, जिसके राम-सरीखे पुत्र हैं! बारात सजाओ, शुभ मुहूर्त में चलो।





