विस्तृत उत्तर
नारदजी वाणी की पवित्रता का मापदंड केवल साहित्यिक सौंदर्य नहीं मानते। वे कहते हैं कि कोई वाणी रस, भाव और अलंकार से युक्त हो, पर उसमें भगवान श्रीकृष्ण के यश का गान न हो, तो वह परमहंसों को प्रिय नहीं होती। फिर वे उल्टा उदाहरण देते हैं: कोई रचना बहुत सुंदर न हो और उसमें शब्द-दोष भी हों, लेकिन यदि उसके प्रत्येक पद में अनंत भगवान के यश-सूचक नाम अंकित हों, तो वह लोगों के पापों का नाश करने वाली होती है। साधुजन ऐसी वाणी को सुनते, गाते और ग्रहण करते हैं। इसलिए साधारण भाषा भी भगवान के नाम, यश और स्मरण से पवित्र हो सकती है; मुख्य तत्व भगवत्संबंध है।
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