विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवतमाहात्म्य में सत्संग की महिमा नारदजी के वचनों से स्पष्ट होती है। बदरीवन में सनकादि ऋषियों का दर्शन पाकर नारदजी कहते हैं कि उनका समागम बड़े भाग्य से हुआ है। वे सनकादि को वैकुंठवासी, हरि-कीर्तन में तत्पर और भगवकथा को जीवन का आधार मानने वाले बताते हैं। वर्णन के अंत में नारदजी कहते हैं कि महानुभावों का दर्शन जीव के संपूर्ण पापों को तुरंत नष्ट करता है और संसार-दुखरूपी दावानल से तपे हुए लोगों पर शीघ्र शांति की वर्षा करता है। फिर वे कहते हैं कि जब अनेक जन्मों के संचित पुण्य का उदय होता है, तब मनुष्य को सत्संग मिलता है। वह सत्संग अज्ञान से उत्पन्न मोह और मद के अंधकार को नष्ट करके विवेक जगाता है। इसलिए स्रोत के अनुसार सत्संग जरूरी है क्योंकि वह पाप-नाश, शांति, विवेक और भक्ति की दिशा देता है।
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