विस्तृत उत्तर
नारदजी का अनुभव सत्संग से भक्ति पैदा होने की प्रक्रिया दिखाता है। वे संतों की सेवा में लगे, चंचलता छोड़ी, विनम्र रहे और आज्ञा का पालन किया। संतों की कृपा से प्रसाद ग्रहण किया, जिससे उनके पाप धुले और चित्त शुद्ध हुआ। फिर वे उन्हीं महात्माओं से प्रतिदिन श्रीकृष्ण की मनोहर कथाएँ सुनते रहे। वे श्रद्धापूर्वक एक-एक पद सुनते थे, इसलिए भगवान में उनकी रुचि बढ़ी। जब भगवान में रुचि हुई, तो मन की स्थिरता भी भगवान की ओर हुई और उन्होंने जगत को परमात्मा में माया से कल्पित रूप में देखा। शरद और वर्षा में महात्माओं द्वारा हरि के निर्मल यश का संकीर्तन सुनते-सुनते रजोगुण-तमोगुण को हटाने वाली भक्ति उनके हृदय में प्रकट हुई।
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