विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवत को परम धर्म इसलिए कहा गया है कि इसमें मोक्ष तक के फल की कामना से भी रहित धर्म का निरूपण बताया गया है। पाठ इसे महामुनि व्यासदेव द्वारा निर्मित ग्रंथ कहता है और बताता है कि इसमें शुद्ध अंतःकरण वाले सत्पुरुषों के जानने योग्य वास्तविक वस्तु, परमात्मा, का वर्णन है। यह परमात्मा तीन तापों का मूल से नाश करने वाला और परम कल्याण देने वाला है। इस धर्म में कपट, स्वार्थ या केवल फल-लाभ की दृष्टि प्रधान नहीं है। आगे कहा गया है कि जब सुकृती पुरुष इसके श्रवण की इच्छा करते हैं, तब ईश्वर तुरंत उनके हृदय में आकर बंध जाता है। इसलिए यहाँ परम धर्म का अर्थ निष्काम, परमात्म-केन्द्रित और कल्याणकारी धर्म है।
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