विस्तृत उत्तर
नारदजी धर्म और भक्ति का अंतर स्पष्ट करते हैं। वे कहते हैं कि जो मनुष्य अपना धर्म छोड़कर भगवान के चरणकमलों का भजन करता है, उसका भजन परिपक्व होने से पहले छूट भी जाए तो उसका अमंगल नहीं होता। इसके विपरीत वे पूछते हैं कि जो भगवान का भजन नहीं करते और केवल स्वधर्म का पालन करते हैं, उन्हें कौन-सा वास्तविक लाभ प्राप्त हुआ। यह कथन धर्म को नकारने के लिए नहीं, बल्कि धर्म का लक्ष्य बताने के लिए है। नारदजी पहले ही कह चुके हैं कि भगवान का यश न हो तो ज्ञान और कर्म शोभा नहीं पाते। इसलिए केवल बाहरी धर्मपालन अंतिम नहीं है; उसका सार भगवान की भक्ति, स्मरण और चरणसेवा में है।
आगे क्या पढ़ें
प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी पंचांग लिंक





