विस्तृत उत्तर
जब अनेक पुण्यकर्म और दान के बाद भी आत्मदेव को संतान नहीं मिली, तब वे बहुत चिंतित और दुखी हो गए। एक दिन वे दुख से घर छोड़कर वन की ओर चले गए। दोपहर के समय उन्हें प्यास लगी, इसलिए वे एक तालाब के पास पहुँचे। संतान के अभाव के दुख ने उनका शरीर क्षीण कर दिया था। जल पीकर वे थकान के कारण वहीं बैठ गए। कुछ समय बाद वहाँ एक संन्यासी महात्मा आए। आत्मदेव ने उनके जल पी लेने के बाद जाकर उनके चरणों में नमस्कार किया और सामने खड़े होकर लंबी साँसें लेने लगे। इसी स्थान पर संन्यासी उनसे उनके दुख का कारण पूछते हैं।
आगे क्या पढ़ें
प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी पंचांग लिंक





