विस्तृत उत्तर
सूतजी स्वयं बताते हैं कि उन्होंने भागवत कथा कैसे ग्रहण की। जब महातेजस्वी शुकदेवजी महाराज गंगातट पर राजा परीक्षित को इस पुराण की कथा कह रहे थे, तब सूतजी भी वहाँ बैठे थे। उन्होंने शुकदेवजी की कृपापूर्ण अनुमति से इसका अध्ययन किया। फिर वे शौनकादि ऋषियों से कहते हैं कि जैसा उनका अध्ययन है और उनकी बुद्धि ने जितना तथा जिस प्रकार इसे ग्रहण किया है, उसी के अनुसार वे इसे सुनाएँगे। इससे भागवत कथा की श्रवण-परंपरा स्पष्ट होती है: व्यास से शुकदेव, शुकदेव से परीक्षित की सभा में श्रवण, और वहाँ से सूतजी द्वारा नैमिषारण्य में ऋषियों को कथन।
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