विस्तृत उत्तर
जब आत्मदेव गोकर्ण के वचनों से वन जाने को तैयार होते हैं, तब वे पूछते हैं कि वन में क्या करना चाहिए। गोकर्ण उन्हें विस्तार से बताते हैं कि शरीर को हड्डी, मांस और रक्त का पिंड समझकर उसमें ‘मैं’ का अभिमान छोड़ो। पत्नी-पुत्र आदि में ममता मत रखो। संसार को रात-दिन क्षणभंगुर देखो और वैराग्य में रुचि रखकर भगवान की भक्ति में लगो। वे कहते हैं कि भगवद्भजन ही सबसे बड़ा धर्म है; दूसरे लौकिक धर्मों से मुख मोड़ो, साधु पुरुषों की सेवा करो, काम-तृष्णा को दूर रखो, दूसरों के गुण-दोष का विचार छोड़ो और भगवान की सेवा तथा कथा के रस का पान करो। यही वन में आत्मदेव का साधन बताया गया है।
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