विस्तृत उत्तर
वरीयान योग पंचांग के 27 नित्ययोगों में अष्टादश योग है। यह श्रेष्ठता और विशिष्टता का प्रतीक है।
नाम का अर्थ — 'वरीयान' = श्रेष्ठतर, अधिक वरेण्य। यह योग उच्च स्तर और श्रेष्ठ फलों का द्योतक है।
गणना विधि — जब सूर्य और चंद्र के संयुक्त भोगांश 226°40' से 240° के बीच होते हैं, तब वरीयान योग होता है।
स्वामी देवता — अग्नि।
शुभाशुभ फल — यह शुभ योग है। श्रेष्ठ कार्यों, उन्नति और विशिष्ट उपलब्धियों के लिए उत्तम।
जन्म-फल — इस योग में जन्मे व्यक्ति प्रतिभाशाली, सुरुचिपूर्ण और विशिष्ट होते हैं। ये अपने क्षेत्र में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त करते हैं। इनकी जीवनशैली उच्च-स्तरीय होती है। ये समाज में आदर और सम्मान पाते हैं। राज-काज, प्रशासन और उच्च पदों के लिए उपयुक्त।
मुहूर्त में प्रयोग — पदारोहण, पुरस्कार समारोह, उच्च शिक्षा प्रवेश और महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति के लिए उत्तम।





