विस्तृत उत्तर
व्यतिपात योग पंचांग के 27 नित्ययोगों में सप्तदश योग है। यह 9 अशुभ योगों में सर्वाधिक भयंकर योगों में से एक माना जाता है।
नाम का अर्थ — 'व्यतिपात' = व्यतिक्रम, विपरीत, आपदा। यह योग अत्यंत विनाशकारी और प्रतिकूल परिस्थितियों का बोधक है।
गणना विधि — जब सूर्य और चंद्र के संयुक्त भोगांश 213°20' से 226°40' के बीच होते हैं, तब व्यतिपात योग होता है।
स्वामी देवता — रुद्र।
शुभाशुभ फल — यह अत्यंत अशुभ योग है। वायु-तत्व का यह योग सर्वाधिक अस्थिरकारी है। इस योग में विवाह, गृह प्रवेश, व्यापार, लंबी यात्रा और कोई भी शुभ कार्य कदापि न करें।
जन्म-फल — इस योग में जन्मे व्यक्तियों को जीवन के शुरुआती वर्षों में कड़ा संघर्ष करना पड़ता है। उतार-चढ़ाव अधिक होते हैं। इन्हें धैर्य रखना और योग के स्वामी रुद्र की शांति करनी चाहिए।
शांति उपाय — महामृत्युंजय मंत्र का जाप, शिव पूजन और व्यतिपात श्राद्ध (पितरों का विशेष तर्पण) इस दिन अत्यंत फलदायी होता है।





