विस्तृत उत्तर
वैधृति योग पंचांग के 27 नित्ययोगों में सप्तविंश (27वाँ) और अंतिम योग है। यह व्यतिपात के साथ 9 अशुभ योगों में सर्वाधिक शक्तिशाली और प्रभावशाली अशुभ योग माना जाता है।
नाम का अर्थ — 'वि' = विपरीत और 'धृति' = धारण। अर्थात् विपरीत धारणा, उलटा-पुलटा। यह योग मार्ग में अवरोध और जीवन में अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव का बोधक है।
गणना विधि — सूर्य और चंद्रमा के भोगांशों का योगफल जब 346°40' से 360° (0°) के बीच होता है, तब वैधृति योग होता है। यह चक्र का अंतिम योग होने से विशेष माना जाता है।
स्वामी देवता — वरुण।
शुभाशुभ फल — यह अत्यंत अशुभ योग है। व्यतिपात के साथ यह दो सर्वाधिक अशुभ नित्ययोगों में गिना जाता है। इस योग में विवाह, गृह प्रवेश, व्यापार आरंभ, दीर्घ यात्रा, नया वाहन खरीदना, संपत्ति लेन-देन और कोई भी महत्वपूर्ण मांगलिक कार्य पूर्णतः वर्जित है।
विशेष नियम — पंचांग शास्त्र में वैधृति के अंतिम 4 घड़ी (लगभग 1 घंटे 36 मिनट) में कोई भी शुभ कार्य न करने की विशेष चेतावनी है।
जन्म-फल — वैधृति योग में जन्मे व्यक्ति चतुर और साहसी होते हैं। ये परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढाल लेते हैं। जीवन में उतार-चढ़ाव अधिक आते हैं। प्रारंभिक जीवन में कठिनाइयाँ होती हैं किंतु अपने बल और बुद्धि से ये आगे बढ़ते हैं। इन्हें स्वास्थ्य के प्रति सावधान रहना चाहिए।
स्वास्थ्य — उतार-चढ़ाव हो सकते हैं। नियमित दिनचर्या और योग से लाभ होता है।
करियर — इन्हें जोखिम-भरे क्षेत्रों में काम करने में कठिनाई नहीं होती — रणनीति, जासूसी, शेयर बाजार आदि में सफल हो सकते हैं।
शांति उपाय — वैधृति श्राद्ध (पितरों का विशेष तर्पण) इस दिन किया जाए तो अत्यंत फलदायी होता है। वरुण देव की पूजा, जल का दान और महामृत्युंजय मंत्र का जाप इस योग के नकारात्मक प्रभाव को कम करता है।





