विस्तृत उत्तर
सिद्ध योग पंचांग के 27 नित्ययोगों में एकविंश (21वाँ) योग है। यह सफलता, पूर्णता और आत्मसिद्धि का प्रतीक है।
नाम का अर्थ — 'सिद्ध' = जो सिद्ध हो चुका हो, पूर्ण। यह योग हर संकल्प की पूर्णता और कार्य की अपरिहार्य सफलता का बोधक है।
गणना विधि — सूर्य और चंद्रमा के भोगांशों का योगफल जब 266°40' से 280° के बीच होता है, तब सिद्ध योग होता है।
स्वामी देवता — कार्तिकेय (षण्मुख/स्कंद)।
शुभाशुभ फल — यह अत्यंत शुभ योग है। इस योग में आरंभ किए गए सभी कार्यों में सफलता निश्चित मानी जाती है। व्यापार, विवाह, शिक्षा, साधना, चिकित्सा और यात्रा सभी के लिए अत्यंत उत्तम है।
जन्म-फल — सिद्ध योग में जन्मे व्यक्ति सभी प्रकार के व्यवसायों को करने में चतुर होते हैं। इन्हें सुंदर और बुद्धिमान जीवनसाथी मिलता है। प्रचुर मात्रा में धन की प्राप्ति होती है और ये सुखमय जीवन व्यतीत करते हैं। इनकी बुद्धि तीव्र और निर्णय-क्षमता उत्कृष्ट होती है। ये जो कार्य हाथ में लें, उसे पूर्णता तक पहुँचाते हैं।
स्वास्थ्य — इनका स्वास्थ्य सामान्यतः अच्छा रहता है। मानसिक शक्ति प्रबल होती है।
करियर — शोध, तकनीक, चिकित्सा और आध्यात्मिक क्षेत्रों में विशेष सफलता मिलती है।
मुहूर्त में प्रयोग — नया व्यापार, परीक्षा, दीक्षा, मंत्र-सिद्धि, शल्यचिकित्सा और विवाह के लिए सर्वोत्तम। इस योग में लिया गया संकल्प अवश्य सफल होता है।





