विस्तृत उत्तर
परिघ योग पंचांग के 27 नित्ययोगों में एकोनविंश (19वाँ) योग है। यह 9 अशुभ योगों में से एक है।
नाम का अर्थ — 'परिघ' = बाड़ा, अवरोधक दंड। यह योग चारों ओर से घिरे रहने और बाधाओं का बोधक है।
गणना विधि — जब सूर्य और चंद्र के संयुक्त भोगांश 240° से 253°20' के बीच होते हैं, तब परिघ योग होता है।
स्वामी देवता — विश्वकर्मा।
शुभाशुभ फल — यह अशुभ योग है। इस योग में महत्वपूर्ण यात्राएं, व्यापार, विवाह और आर्थिक लेन-देन से बचना चाहिए। जीवन के उत्तरार्ध में इस योग के दोष कम होते हैं।
जन्म-फल — इस योग में जन्मे व्यक्ति बुद्धिमान, बहुविषयी ज्ञाता और समाज में सम्मानित होते हैं। ये श्रेष्ठ कवि, लेखक और शिक्षक हो सकते हैं। साहसी और उद्योगी प्रकृति के होते हैं। व्यापार में आर्थिक कठिनाइयां आ सकती हैं। शारीरिक रूप से ये दुबले और सीमित भोजन करने वाले होते हैं। जीवन के उत्तरार्ध में ये प्रायः आध्यात्मिक होते जाते हैं।
शांति उपाय — विश्वकर्मा पूजन और शिल्प कार्य में श्रद्धा से इस योग के दोष कम होते हैं।





