विस्तृत उत्तर
विष्कुम्भ योग पंचांग के 27 नित्ययोगों में प्रथम योग है। यह 9 अशुभ योगों में से एक माना जाता है।
नाम का अर्थ — 'विष' अर्थात् जहर और 'कुम्भ' अर्थात् घड़ा। अर्थात् यह योग विष से भरे घड़े के समान है। जिस प्रकार विष पान करने से सारे शरीर में धीरे-धीरे विष फैल जाता है, उसी प्रकार इस योग में किए गए कार्यों का फल अशुभ होता है।
गणना विधि — यह योग सूर्य और चंद्रमा की भोगांश स्थितियों के योगफल पर आधारित है। जब सूर्य और चंद्र के संयुक्त भोगांश 0° से 13°20' के बीच होते हैं, तब विष्कुम्भ योग होता है।
स्वामी देवता — यक्ष।
शुभाशुभ फल — यह अशुभ योग है। इस योग में विवाह, गृह प्रवेश, नया व्यापार, यात्रा और अन्य मांगलिक कार्य वर्जित हैं।
जन्म-फल — इस योग में जन्म लेने वाले व्यक्ति प्रभावशाली और दबदबे वाले होते हैं, परंतु शत्रुओं से घिरे रहते हैं। ये अपने परिजनों के प्रति समर्पित होते हैं। आर्थिक रूप से संघर्ष हो सकता है परंतु परिश्रम से सफलता मिलती है।
शांति उपाय — भगवान शिव की उपासना और हनुमान चालीसा का पाठ इस योग के नकारात्मक प्रभाव को कम करता है।
मुहूर्त में प्रयोग — इस योग में कोई भी शुभ कार्य न करें। यदि अनिवार्य हो तो योग की समाप्ति के बाद कार्य करें।





