विस्तृत उत्तर
शूल योग पंचांग के 27 नित्ययोगों में नवम योग है। यह 9 अशुभ योगों में से एक है।
नाम का अर्थ — 'शूल' = त्रिशूल या तीखा दर्द। जैसे शूल (कांटा) चुभने पर तीव्र पीड़ा होती है, इस योग में किए गए कार्यों में भी बाधाएं और पीड़ा होती है।
गणना विधि — जब सूर्य और चंद्र के संयुक्त भोगांश 106°40' से 120° के बीच होते हैं, तब शूल योग होता है।
स्वामी देवता — सर्प (नाग)।
शुभाशुभ फल — यह अशुभ योग है। इस योग में विवाह, गृह प्रवेश, नई यात्रा और व्यापार आरंभ से बचना चाहिए। रोग और कलह की संभावना रहती है।
जन्म-फल — इस योग में जन्मे व्यक्ति कठोर स्वभाव के, संघर्षशील और दृढ़ इच्छाशक्ति वाले होते हैं। जीवन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है किंतु ये हार नहीं मानते। स्वास्थ्य के प्रति सावधान रहना आवश्यक है।
शांति उपाय — नाग पूजन, महामृत्युंजय मंत्र जाप और शिव-अभिषेक उपयोगी है।





