विस्तृत उत्तर
आत्मदेव के धन का नाश दो चरणों में दिखता है। पहले संतान प्राप्ति की आशा में उन्होंने अनेक पुण्यकर्म किए और दीन-दुखियों को गौ, भूमि, सोना और वस्त्र आदि दान दिए। पाठ कहता है कि इस धर्ममार्ग में उनका आधा धन समाप्त हो गया, पर संतान नहीं मिली। बाद में धुंधुकारी के जवान होने पर दूसरा बड़ा संकट आया। वह वेश्याओं के कुसंग में पड़ गया और उसने पिता की संपत्ति नष्ट कर दी। फिर एक दिन माता-पिता को मार-पीटकर घर के बर्तन भी उठा ले गया। इस प्रकार संतान की चाह में धन गया और कुपुत्र के दुराचार से शेष संपत्ति भी नष्ट हुई।
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